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उपराष्ट्रपति ने 2025 तक टीबी को खत्म करने के लिए जन आंदोलन का आह्वान किया

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‘सामाजिक जुड़ाव लक्ष्य हासिल करने की कुंजी है’

उपराष्ट्रपति ने टीबी मुक्त होने वाली महिलाओं की सराहना की; तपेदिक से लड़ने के लिए लिंग-संवेदनशील दृष्टिकोण का आह्वान; महिलाओं के लिए बेहतर परामर्श, पोषण और घर-घर जाकर जांच करने का सुझाव दिया

‘लोगों तक यह संदेश पहुंचायें कि टीबी की रोकथाम और इलाज संभव है’: उपराष्ट्रपति

श्री नायडु ने निर्वाचित प्रतिनिधियों से स्थानीय स्तर पर नियमित समीक्षा करने और टीबी को लेकर गलत सोच को दूर करने के लिये बातचीत में भाग लेने का आह्वान किया

उपराष्ट्रपति ने टीबी के खिलाफ महिलाओं की जीत पर राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया
उपराष्ट्रपति, श्री एम. वेंकैया नायडु ने 2025 तक ‘टीबी मुक्त भारत’ अभियान में लोगों को ‘प्रमुख भागीदार’ बनाने का आज आह्वान किया। उन्होंने जोर देकर कहा, “टीबी को पूरी तरह खत्म करने के लिए समाज का जुड़ाव किसी भी अन्य बीमारी के मुकाबले कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है”, उन्होंने जोर देकर कहा। यह देखते हुए कि समाज के कमजोर वर्गों पर तपेदिक का प्रभाव कहीं ज्यादा पड़ता है, उन्होंने टीबी उन्मूलन के लिये बड़े पैमाने पर संसाधनों का इस्तेमाल करने और अलग अलग क्षेत्रों से आगे आने का आह्वान किया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि टीबी को पूरी तरह खत्म करने के लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है जब इसे जन आंदोलन का रूप दिया जाये और सभी स्तरों पर जन प्रतिनिधियों से ‘जन आंदोलन’ में लोगों को शामिल करने के लिये आगे आने का आह्वान किया जाये। उन्होंने कहा कि 2025 तक भारत को टीबी मुक्त बनाने के लिए ‘टीम इंडिया’ की भावना को अपनाकर बहुआयामी प्रयास की जरूरत है।

टीबी के खिलाफ लड़ाई जीतने वाली महिलाओं पर राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि टीबी उन्मूलन पर सरकार की गंभीरता साफ दिखती है क्योंकि यह इस वर्ष टीबी से संबंधित दूसरा सम्मेलन था। उन्होंने खुशी व्यक्त की कि सम्मेलन में न केवल सांसद, बल्कि अन्य जन प्रतिनिधि, टीबी उन्मूलन के लिए काम करने वाले संगठन, टीबी से मुक्त होने वाली महिलायें, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आदि शामिल हैं।

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने टीबी से मुक्त होने वाली महिलाओं के साहस की प्रशंसा की, जिनमें से कुछ ने अपने अनुभव सुनाये। श्री नायडु ने जोर देकर कहा कि टीबी के प्रति लैंगिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, यह देखते हुए कि यह बीमारी महिलाओं पर कहीं अधिक असर डाल सकती है। उन्होंने देखा कि महिलाओं को स्वास्थ्य, कल्याण और पोषण में प्राथमिकता न मिलने से वो इस बीमारी का ज्यादा शिकार बनती हैं। उन्होंने कहा, “यदि टीबी पाया जाता है तो परित्याग और हिंसा के दुख को देखते हुए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि महिलाओं में टीबी के बड़ी संख्या में मामले दर्ज नहीं किये जाते इसलिये इलाज भी नहीं हो पाता”, उन्होंने कहा।

उपराष्ट्रपति ने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से बीमारी के बारे में बेहतर और व्यवस्थित परामर्श, निश्चय पोषण योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से बेहतर पोषण सहायता और टीबी से पीड़ित बच्चों, गर्भवती और प्रसवोत्तर महिलाओं पर विशेष ध्यान देने जैसे उपायों से इसका मुकाबला करने का आह्वान किया। उन्होंने राज्यों से डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग करने के लिए सक्रिय कदम उठाने का आग्रह किया, खासकर उन महिलाओं के लिए जो अपने बल पर स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली से संपर्क करने के लिये तैयार नहीं हैं।

2025 तक पूर्ण उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सरकार के सभी स्तरों से ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देते हुए, श्री नायडु ने लोगों की पोषण स्थिति में सुधार, बेहतर संपर्क जांच, बीमारी पर होने वाले खर्च को कम करने, सबसे कमजोर वर्गों को सुरक्षित रखने और पर्वतीय और दूरदराज के क्षेत्रों में टीबी का शीघ्र पता लगाने जैसे कदम उठाने का आह्वान किया।

टीबी के बारे में सामाजिक धारणा को बदलने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए, श्री नायडु ने कहा कि बीमारी के शारीरिक प्रभाव के अलावा, लोगों के जीवन पर बहुत अधिक आर्थिक और सामाजिक दबाव पड़ता है। “टीबी रोगियों को बड़े पैमाने पर परिवारों, नियोक्ताओं और समाज की अनावश्यक गलत सोच का सामना करना पड़ता है। यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है और इसे रोका जाना चाहिये”, उन्होंने जोर दिया।

श्री नायडू ने कहा कि बीमारी को लेकर समाज का व्यवहार बीमारी की प्रारंभिक अवस्था में जांच को और भी मुश्किल बना देता है, यह दर्शाता है कि 2020 में अनुमानित 26 लाख के मुकाबले टीबीके केवल 18 लाख नये मामले सामने आए। तपेदिक के बारे में सामाजिक धारणा को बदलने के लिए बेहतर जागरूकता और इसके पक्ष को रखने वाले कार्यक्रमों का आह्वान करते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि “लोगों तक यह संदेश पहुंचना चाहिये कि टीबी निश्चित रूप से रोकथाम योग्य और इलाज योग्य है।”

उन्होंने सुझाव दिया कि टीबी का पक्ष रखने वाले कार्यक्रमों को महामारी के कारण फेफड़ों के स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरुकता का फायदा बीमारी के बारे में जानकारी फैलाने में करना चाहिये।

इस संबंध में, उपराष्ट्रपति ने निर्वाचित प्रतिनिधियों – सांसदों, विधायकों और ग्राम प्रधानों से भी आग्रह किया कि वे जिला और तहसील स्तर पर नियमित समीक्षा करें। उन्होंने जन-प्रतिनिधियों का आह्वान किया कि वे जन संवाद में सक्रिय भूमिका निभाते हुए टीबी के खिलाफ लड़ाई के लिये जन जागरूकता अभियान में उत्प्रेरक बनें।

उपराष्ट्रपति ने महिला और बाल विकास मंत्रालय, और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों के एक साथ आने और “महिलाओं पर टीबी के प्रभाव को कम करने के लिए नई रणनीति विकसित करने के तरीके पर गंभीर चर्चा” शुरू करने के प्रयासों की सराहना की।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, रसायन और उर्वरक मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी, राज्य मंत्री डॉ. भारती प्रवीण पवार, राज्य मंत्री डॉ. मुंजपरा महेन्द्रभाई, सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, श्री राजेश भूषण, सचिव, महिला एवं बाल विभाग, श्री इंदीवर पांडे, और अन्य इस कार्यक्रम के दौरान उपस्थित थे।

उपराष्ट्रपति के भाषण का पूरा पाठ पढ़ने के लिए कृपया अंग्रेजी की विज्ञप्ति देखें: