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ओबीसी आरक्षण पर एमपी हाई कोर्ट का राज्य सरकार को नोटिस, जवाब नहीं आया तो 15 हजार रुपये का जुर्माना

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 जबलपुर
 मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत व न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देने की मांग को लेकर दायर याचिका पर राज्य शासन को जवाब पेश करने अंतिम मोहलत दी है।

साथ ही साफ कर दिया है कि यदि जवाब नहीं आया तो 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 16 जून वाले सप्ताह में नियत की गई है। याचिकाकर्ता जबलपुर की एडवोकेट यूनियन फार डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर व विनायक प्रसाद शाह ने पक्ष रखा।

एक साल में 11 बार सुनवाई, जवाब पेश नहीं किया

वर्ष 2024 में याचिका दायर कर प्रदेश में ओबीसी वर्ग को संख्या के अनुपात में आरक्षण दिए जाने की मांग की गई थी। एक साल में 11 बार सुनवाई हुई, लेकिन सरकार ने जवाब पेश नहीं किया। कोर्ट को बताया गया कि 2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में एससी की 15.6 प्रतिशत, एसटी की 21.14 प्रतिशत, ओबीसी की 50.9 प्रतिशत, मुस्लिम की 3.7 प्रतिशत आबादी है। शेष 8.66 प्रतिशत अनारक्षित वर्ग की जनसंख्या है।

प्रदेश में एससी को 16 प्रतिशत, एसटी को 20 प्रतिशत, ओबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। प्रदेश में ओबीसी वर्ग 51 प्रतिशत की आबादी है, इसलिए उसी अनुपात में आरक्षण दिया जाना चाहिए।

आयोग बना लेकिन ओबीसी वर्ग के उत्थान पर काम नहीं हुआ

दलील दी गई कि इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को यह निर्देश दिए थे कि ओबीसी वर्ग को निर्धारित मापदंडों के आधार पर उनकी सामाजिक, आर्थिक शैक्षणिक स्थितियों का नियमित रूप से परीक्षण करने के लिए स्थायी अयोग गठित किया जाए। आयोग तो बना, लेकिन ओबीसी वर्ग के उत्थान के लिए काम नहीं हुआ।