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8वें एलएम सिंघवी व्याख्यान में उपराष्ट्रपति के भाषण के अंश

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हम विश्व के सबसे जीवंत लोकतंत्र हैं जो एक आदर्श स्तर का प्रतिनिधि है।

हमने उस संविधान सभा से शुरुआत की, जिसमें समाज के सभी वर्गों से अत्यधिक प्रतिभाशाली सदस्य सम्मिलित थे। लेकिन उत्तरोत्तर प्रत्येक चुनाव के साथ हमारी संसद प्रामाणिक रूप से लोगों के जनादेश लोगों के ज्ञान को दर्शाती है और अब हमारे पास संसद में जो कुछ है वह काफी प्रतिनिधिक है और वैश्विक स्तर पर उस गिनती में हमारे जैसा कोई और नहीं है।

हमें केवल एक ही बात ध्यान में रखनी चाहिए- सबसे पहले—भारत का हित।

हमारे संविधान की प्रस्तावना में यह इंगित किया गया है-हम लोग। यानी सत्ता लोगों में बसती है-उनका जनादेश, उनका ज्ञान। भारतीय संसद लोगों के मन को दर्शाती है।

वर्ष 2015-16 में, संसद एक संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित रही थी और एक कीर्तिमान के रूप में पूरी लोकसभा ने सर्वसम्मति से मतदान किया। न कोई विरोध था और न कोई अनुपस्थिति। और संशोधन पारित किया गया। राज्यसभा में भी यह सर्वसम्मत था, मात्र एक अनुपस्थिति थी। हम लोग-उनके जनादेश   को संवैधानिक प्रावधान में बदल दिया गया।

जनता की शक्ति, जो एक वैध मंच के माध्यम से व्यक्त की गई थी, वह शक्ति पूर्ववत थी। विश्व ऐसे किसी और उदाहरण के बारे में नहीं जानता।

मैं यहां उपस्थित लोगों से आग्रह करता हूं क्योंकि वे एक ऐसे न्यायिक अभिजात्य वर्ग, सोचने वाले दिमाग, बुद्धिजीवियों का गठन करते हैं-कृपया विश्व में ऐसा कोई समानांतर उदाहरण खोजें जहां किसी संवैधानिक प्रावधान को पूर्ववत किया जा सकता है ।

हमारा भारतीय संविधान स्पष्ट शब्दों में अनुच्छेद 145 (3) प्रदान करता है। जब कानून का एक बड़ा सवाल शामिल हो तो अदालत द्वारा संविधान की व्याख्या की जा सकती है। यह कभी नहीं कहता कि किसी प्रावधान को कम किया जा सकता है ।

इतने जीवंत लोकतंत्र में यदि लोगों के जनादेश के एक संवैधानिक प्रावधान को  पूर्ववत कर दिया जाता है, तब क्या होगा?

मैं सभी से आग्रह कर रहा हूं कि ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें दलगत आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। मैं आशा करता हूं कि हर कोई इस अवसर पर आगे आएगा और इस समय के भारत की विकास गाथा का हिस्सा बनेगा।

मैं हैरान हूं कि इस फैसले के बाद संसद में कोई आहट भी नहीं हुई. इसे ऐसे ही मान लिया गया। लेकिन यह बहुत गंभीर मुद्दा है ।

हमें अपनी न्यायपालिका पर गर्व है। इसने लोगों के अधिकारों को बढ़ावा देने के विकास में योगदान दिया है।

9/11 के बाद अमेरिका ने पैट्रियट एक्ट पारित किया था। परन्तु इतने बहुमत से नहीं। पर इसे इस रूप में मान लिया गया। राष्ट्रहित की प्रधानता इसीलिए होती है।

सोचिए यदि 73वां और 74वां संशोधन रद्द कर दिया जाए। तब क्या होगा?

अब मित्रो, मैं आपके सामने ही कहता हूं कि बुनियादी ढांचे का मूल लोगों की इच्छा की प्रधानता ही है। लोकतंत्र में, लोगों के अधिकारों की व्यापकता से ज्यादा बुनियादी कुछ नहीं हो सकता है। और लोगों के आदेश को एक वैध तंत्र के माध्यम से प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए जोकि पावन रूप में विधायिका ही है।

मुझे विश्वास है कि प्रतिबिंबित करने और सोचने में कभी देर नहीं होती। लम्बे समय से हमारी न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका के साथ ही शासन की महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है। शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत हमारे शासन के लिए मौलिक है।लोकतंत्र के विकास के लिए इन संस्थानों का सामंजस्यपूर्ण रूप से काम करना महत्वपूर्ण है। एक के द्वारा दूसरे के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की घुसपैठ, चाहे वह कितनी भी सूक्ष्म क्यों न हो, शासन की चलती गाड़ी को अस्थिर करने की क्षमता रखती है।

हमारे पास एक संसद है जो इस समय कहीं अधिक प्रतिनिधिक है।

मेरा अनुरोध है कि इस देश के एक सच्चे नागरिक के रूप में एक जनमत तैयार करें कि राजनीतिक रुख को हमारे संवैधानिक कामकाज की उच्चता से दूर ही  रखा जाना चाहिए।

अभी बहुत देर नहीं हुई है। हम मूल संरचना सिद्धांत के साथ रहते हैं। हमने इसे इसी रूप में लिया है। और यह 7 से 6 के बहुमत से था।

कानून के एक छात्र के रूप में, क्या संसद की संप्रभुता से कभी समझौता किया जा सकता है? और क्या एक आने वाली संसद को पिछली संसद द्वारा किए गए कार्यों से ही बाँधा जा सकता है ?

मैं चाहता हूँ कि आप इस विषय पर भी विचार करें।